फरदा:मेरा गांव मेरा अभिमान भाग 2

 


जैसा कि हमने पिछली पोस्ट में लिखा कि बड़े जमींदार होने के बावजूद भी फरदा के इतिहास में रैयतों से किसी बड़े विवाद के उदाहरण नहीं मिलते।पोस्ट के लेखक खुद बिन्दा दियारा, रामसीर खैरा मौजे में अक्सर जाया करते थे और कई रात वहीं गुजारते थे। मुंगेर के पास के बरियारपुर प्रखंड के बगल स्थित बिन्दा दियारे में एक पहलवान जी बडाहिल थे। बिन्दा दियारे में रैय्यत और सिपाही थोड़े आशंकित रहते और रात ढलने के पहले अपने घर पर चले जाने की सलाह देते। चूंकि बिन्दादियारा एक दम गंगा के किनारे था कभी पाट इस तरफ़ कभी उस तरफ और इलाके में अपराधियों खासकर हथियार और गांजा तस्करों की आवाजाही बनी रहती थी सो उनकी सावधानी बरतने की सलाह भी वाजिब थी।

फरदा:मेरा गांव मेरा अभिमान भाग १

परन्तु लखीसराय जिले के चानन प्रखंड स्थित रामसीर खैरा मौजे का माहौल शांतिपूर्ण व बिल्कुल गंवई था। गांव पूरी तरह पिछड़ी,अति पिछड़ी व दलितों का है कुछ गिनती के घर राजपूत हैं।रामसीर में कचहरी थी,तीन कोठरी, ईंटो की दीवार से बना बड़ा बरामदा और एक रसोई घर।लोग बरामदे पर बिछी पुआल के ऊपर दरी के ऊपर अपना बेडसीट लगाकर और पुआल के अंटिये का तकिया बनाकर सोते थे।खाने व सोने के मामले में बिल्कुल समाजवादी व्यवस्था लागू थी।मालिकान एक आने के हिस्सेदार हों या एक पैसे के सबके लिये मंगल की बनाई मोटी रोटी और घूरा में भुना हुआ छिलके सहित आलू का चोखा । वहां भी बगल के मानो रामपुर के चानो सिंह पहलवान बड़ाहिल थे उन्हीं की जुबानी की वो तीसरी पीढ़ी के मुलाजिम थे।उनके अलावा एक सिपाही व एक खानसामा भी नियुक्त थे जिन्हें मज़दूरी के एवज में जायदाद मिली हुई थी।


लगभग 75 बीघे की मौजे था धान की कटनी के वक्त जब मालिको का जमावड़ा लगता तो हर वर्ष बदलने वाली मोटी फुस की छप्पर वाली कचहरी गुलजार हो जाया करती थी।लगभग 15 मालिकान वहां पहुंचते अपनी अपनी झोली में सप्ताह दस दिन की खुराकी का इंतजाम के साथ। सभी से एक निश्चित माप में सुबह शाम चावल,आंटा, दाल नापकर ले लिया जाता।सब्जी के नाम पर घूरा(अलाव) में पकाई हुई आलू का चोखा ही चलता था।इस तरह एक सप्ताह में यह आशियाना बिखर जाता।काटी गई धान को वही किसी ऊंचे खेत में  गिनती कर टाल बनाकर  सैंत(एक के ऊपर एक लाइन) दिया जाता था।ईमानदारी इतनी की डेढ़ महीने बाद रजिस्टर में लिखी एक एक अंटिये कि गिनती सही आती थी।


एक डेढ़ महीने बाद धान की डेंगौणी के वक्त ऐसा ही जमावड़ा बैजी बहियार में लगता था। ऐतिहासिक दैता बांध के ऊपर बने मचान में बड़ाहिल जी का डेरा और नीचे पुआल की मेक शिफ्ट मोरकी में मालिकों का आशियाना।खेत के किनारे एक कच्चा कुआं था जिसकी थोड़ी खुदाई होती और पानी निकल आता।उस कुंए का पानी इतना मीठा व सुपाच्य था कि दिन भर बैठे रहने वाले व्यक्ति की खुराक भी डेढ़ गुनी हो जाती थी। धान की फाइनल तैयारी का यह दौर भी सप्ताह दस दिन तक चलता था।


दोपहर तक गांव के पुरुष व महिला मजदूर धान की पुआल को काठ के दरख़्त पर पीट पीट कर धान अलग करते और फिर इसकी तराजू से तौल होता,तौलने वाले फरदा के ही साव जी थे जिनकी दूसरी पीढ़ी इस काम में लगी थी। साव जी के रामे जी राम एक से शुरू हुई गिनती को ध्यान से सुनना व लिखना जरूरी था नहीं तब सब धन बाइस पसेरी होने के चांसेज ज्यादा थे।


लेखक का रामसीर प्रवास उनके जीवन के सबसे सुखद व रोमांचकारी अनुभवों में एक है। रामसीर खैरा गांव विंध्य पर्वत श्रृंखला के कजरा पहाड़ की तलहटी में बसा हुआ है।पहाड़ के उसपार बिहार सरकार द्वारा एक बड़े डैम का निर्माण करवाया गया है।इस डैम के पानी को पहाड़ से इसपार लाने के लिए स्थानीय जल्लप्पा स्थान के पास पहाड़ को काटकर पानी निकलने का मार्ग बनाया गया है।


श्रृंगी ऋषि स्थान डैम के ऊपर पहाड़ियों के बीच अवस्थित है जहां श्रृंगी ऋषि के आश्रम होने की बात शायद बाल्मीकि रामायण में की गई है। यहां सीता, राम व लखन जी के श्रृंगी ऋषि आश्रम में आने की कई कथाएं प्रचलित है। श्रृंगी ऋषि आश्रम में गर्म जल का झरना भी है।श्रृंगी ऋषि आश्रम एक मनोरम स्थल है परन्तु सरकारी उपेक्षा का शिकार होने की वजह से सरकारी अफसर या स्थानीय लोग ही इस जगह तक पहुंच पाते हैं।पिछले दो दशकों से नक्सलियों व अपराधी सरगनाओं के आतंक की वजह से लोगों ने यहां आना कम कर दिया था।


वो आगे कहते हैं कि बड़े बुजुर्ग के अनुसार वर्षों पहले पास के जंगल से पहाड़ को पारकर जंगली जानवर  अक्सर खलिहान तक आ जाया करते थे।बुजुर्गों ने कभी बाघ को भी खलिहान तक आते देखा था।परन्तु श्रृंगी ऋषि डैम के निर्माण के वक्त वहां ज्यादा लोगों की आवाजाही व नहर के निर्माण हेतु पहाड़ तोड़ने की प्रक्रिया में बारूद के धमाकों के बाद जंगली जानवरों का पहाड़ से इसपार आना बंद हो गया। परन्तु समय व राजनीतिक बदलाव मालिकों द्वारा जमीन बेचने तथा बड़ाहिल चानो सिंह की असामयिक मृत्यु से यह आशियाना धीरे धीरे बिखर गया।अब न वो कचहरी रही न खलिहानों में हर वर्ष लगने वाला मेला।


लेखक ने उस गांव की आर्थिक स्थिति को करीब से महसूस किया है वो कहते हैं कि गांव आर्थिक रूप से काफी कमजोर था।ज्यादातर लोगों की आमदनी का जरिया खेती ही थी।गांव के लोग काफी सरल व ईमानदार थे अपने मिहनत का हिस्सा अपने पास और मालिकों का हिस्सा मालिक को फरदा गांव तक पहुँचा देते थे। रामसीर खैरा मौजे की अधिकांश जमीन  फरदा,बेगुसराय के रामदीरी के जमींदारों की थी।कुछ जमीन आसपास के शोभनी,सैदपुरा, चानपुरा के किसानों की थी। लालू राज में बेलगाम हुए अपराधियों के आतंक ,पुलिस प्रशासन की बेचारगी की वजह से फरदा व रामदीरी के ने अपनी जमीनें अपने ही बटाईदारों को बेच दी।आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि पूरे गांव में एक बार में दस कट्ठा जमीन एक बार में भुगतान कर खरीदने की ताकत किसी में भी नहीं थी।


फरदा के यश और वैभव में जिन जमींदारों का योगदान था उनमें से कुछ की रईसी ,कुछ की दूरदर्शिता और बाकियों ने मजबूरी में रामसीर खैरा की जमीन बेचकर वहां से बोरिया बिस्तर समेट लिया।हालांकि कुछ हिस्सेदारों की जमीन अभी भी बची हुई है।

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तो यह थी फरदा गांव के बबुआन की कथा,कुछ और संस्मरण हैं जिसे पूरी जानकारी लेने के बाद प्रस्तुत करूंगा।तब तक लिये विदा होने की अनुमति दें।

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