मैं कौन हूँ ?



मैं कौन ?
Sunday Sandesh के प्रणेता,संस्थापक और  लेखक अजय कुमार जी हैं


इनका पसन्दीदा बायो है,
 जमींदार का पोता,मास्टर का बेटा, बाबूजी की नजरों में पैसे न कमानेवाला योग्य बेटा, मां के लिए नालायक पुत्र, पत्नी का आलसी पति और दो बच्चों का हंसता रोता पिता।  
पेशे से मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव व पहचान एक ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट की। 
स्वभाव से जिज्ञासु,जिद्दी व थोड़ी अलग सोच व नए प्रयोगों का समर्थक।
मींदार का जिक्र इसलिये के बिहार में  इस शब्द के सहारे भी दो तीन पीढियां मुंछ तानकर जी लेती हैं।जमींदारों के वंशज का तमगा लिये लाखों  लोग आपको महानगरों,औद्योगिक शहरों में सैंकड़ो की तादाद में मिल जाएंगे बारह से चौदह घण्टे की पाली में  काम करते,स्टोर रुम से गुड़ की ढेलियाँ चुराकर खाते, ऑटो रिक्शा या टैक्सी चलाते ,रेहड़ियों पटरियों पर सामान बेचते  जमींदार खानदान के वंशज आपको हर महानगर और औद्योगिक शहरों में मिल जाएंगे। और कहीं मिलें न मिले देशभर के सुलभ शौचालय में इस प्रजाति के लोग जरूर मिल जाएंगे। उनमें से अधिकांश यही कहेंगे कि साला जमींदारी खत्म किया तो किया ई मंडल कमीशन कमर तोड़ दिया बस दु नम्बर से पीटी, मेन्स, नीट, जेईई छूट गया नय तो हम कहां से कहां रहते।मतलब यह के ये मजबूरी नहीं शौक से उधर चले गए आरक्षण न होता तो इनमें सारे बिहार में कलक्टर,एसपी,बीडीओ या सीओ होते।

खैर  लेखक के बारे में ईतना बता देने से इनकी काबिलियत का पता आपको भी चल गया होगा कि आरक्षण नहीं होता तो ये कम से  प्रधानमंत्री जी के भाषण लेखक तो जरुर होते।हां मुम्बई से याद आया कि  लेखक भी बम्बई रिटर्न हैं!

नका जन्म मुंगेर जिले के फरदा ग्राम के एक प्रतिष्ठित परन्तु निम्न मध्यम परिवार में हुआ था ,इन्होंने बताया कि बाबूजी कहा करते थे हम बड़े जमींदार के वंशज हैं पर इन्होंने जबसे आंखे खोली और होश संभाला, जमींदारों जैसा कुछ दिखा नहीं जन्म के दस बारह वर्ष पहले आलीशान हवेली,दुआरी, खेत बगीचे को गंगा मैया ने अपने कोख में समा लिया।

 इनके दादा (जिन्हें बिहारी बाबा कहते हैं) वो खुद तो जमींदार रह  चुके थे पर मन के सन्यासी थे बस तीन वक्त का खाना, बदन ढ़कने भर वस्त्र से इनको मतलब था बाकी एक आना दो आना जब जमा होता तो मनोहर पोथी खरीद लाते पोते पोतियों को अक्षर ज्ञान देने के लिये।पढ़ने व सीखने की उनकी जिज्ञासा 99 वर्ष की आयु तक भी बनी रही।

क साक्षर दादाजी ने कभी बच्चो को  जमींदार होने का अहसास होने नहीं दिया।वो साक्षर थे और अपने पोते पोतियों यहां तक के प्रपौत्रों को भी अक्षर ज्ञान कराते रहे।लेखक के जीवन पर इनके दादा जी की सादगी,मानवतावादी विचारों का और बाबूजी के समतावादी,ईमानदारी व स्वभिमानी होने  का गहरा प्रभाव है।
जुल्म करो मत जुल्म सहो मत का मंत्र भी उन्हीं से मिला है।

शिक्षा दीक्षा: इनकी प्राथमिक शिक्षा दीक्षा मूलतः बाबा की कोठरी व सीमेंट के चबूतरे से शुरु होकर बाबू जी के सरकारी मध्य विद्यालय और मुंगेर के टाउन हाई स्कूल में हुई है।मगध विश्वविद्यालय के एक अनाम से महाविद्यालय से स्नातक की डिग्री और पटना के तब के चलताऊ और अब के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान IIBM से प्रबन्धन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा हासिल किया है।

पेशा: प्रबंधन में स्नातकोत्तर डिप्लोमा लेने के बाद बड़ी नौकरी की तलाश में स्वप्न नगरी मुंबई का सफर,कुछ दिनों तक छोटी मोटी नौकरी के पश्चात मुंबई से मोहभंग व अपनी मिट्टी की सुगंध से आकर्षित  होकर बरास्ते इंदौर बिहार का सफर।

1991 में इंदौर से संगठित क्षेत्र की दवा कम्पनी में मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव(MR) की नौकरी से शुरु हुई यात्रा उसी स्तर पर स्थिर है।

1995 से आजतक कोलकाता की प्रतिष्ठित दवा कम्पनी Albert David में MR के रुप में कार्यरत। बाबा और बाबूजी के संस्कारों ने कभी समझौते को कबूल नहीं किया,फार्मा सेल्स उद्योग में मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के आर्थिक और मानसिक शोषण से मन उद्वेलित हुआ। 

 1990 के दशक में डंकल व गेट समझौते के खिलाफ चल रहे अभियानों में विद्वान वक्ताओं के भाषण से प्रभावित होकर ट्रेड यूनियन आंदोलन में समर्पित होने का कठिन निर्णय। 2019 में सेल्स प्रोमोशन एम्प्लाइज की फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रेप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया(FMRAI) की कार्यकारिणी सदस्य चुने गए,बिहार झारखंड सेल्स रेप्रेजेंटेटिव्स यूनियन(BSSRU) के उपाध्यक्ष व सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस(CITU) की राज्य कार्यकारिणी का सदस्य हैं।

पिछले 22 वर्षों से बेगुसराय में निवास तथा स्थानीय स्तर पर ट्रेड यूनियन व वाम जनवादी आंदोलन का सक्रिय हिस्सा रहे हैं।वो कहते हैं कि वास्तव में " मैं मानवतावादी और तर्कशील व्यक्ति हुं और इंसानों द्वारा इंसान के शोषण ,जातीय व वर्गीय असमानताओं के बिल्कुल खिलाफ हूं। अपने विद्रोही स्वभाव की वजह से ये वाम जनवादी आंदोलनों से जुड़े हैं खुद को कॉमरेड कहने पर वो कहते हैं 

मैं कॉमरेड होने की स्थिति से तीन कदम पीछे हूं  क्योंकि मैं सर्वहारा हूं, न जाति बंधन से मुक्त , न कर्मकांड छोड़ने की हिम्मत है

व्यक्तित्व
मानवतावादी, हमेशा कमजोर व जरूरतमंद लोगों की  मदद करने की प्रवृति,आर्थिक लेनदेन में ईमानदारी व सुचिता का पालन,अपनी छवि के प्रति अत्यंत संवेदनशील, न गलत करने न गलत सहने की आदत,अख्खड़ व जिद्दी,प्रेम के मामले में अत्यंत संजीदा व सुंदरता का प्रशंसक। स्त्रियों के प्रति स्वाभाविक आकर्षण।

ट्रेड यूनियन एक्टिविस्ट होने के नाते नए श्रम कानूनों का जन विरोधी नीतियों का प्रबल विरोधी परन्तु जरुरी बदलावों का समर्थक।लंबे संघर्ष यात्रा के बावजूद मजदूर व जन विरोधी नीतियों को रोक न पाने का अफसोस जो यह मानने को विवश करता है कि 
परिवर्तन संसार का नियम है यह होकर रहेगा
विचारों से लिबरल लेफ्ट का समर्थक का पर व्यवहार में एक न्यूनतम उपभोक्ता वादी।

भविष्य की योजना: 
आगे भी सामाजिक कार्यों में पूर्ण रूपेण सहभागिता सक्रिय राजनीति में निर्देशक की भूमिका का निर्वहन।अपनी लेखन कला का उपयोग करते हुए,सामाजिक, राजनीतिक व व्यक्तित्व विकास के विषय पर  ब्लॉग लिखना। 
अपने जीवन के अनुभव को युवाओं के विकास हेतु लगाने व  मोटिवेशनल स्पीकर बनने की प्रबल आकांक्षा।व बिहार में एक उत्कृष्ट शिक्षण संस्थान की स्थापना की अधूरी आस।

 बिहारियों के पलायन से क्षुब्ध होकर वो कहते हैं कि बिहारी हार्ड वर्कर व ईमानदार होते हैं और एक अदद  नौकरी खासकर सरकारी नौकरी पाकर संतुष्ट हो जाते हैं।आम बिहारियों में उद्यमिता की भावना की कमी को बिहार के औद्योगिक पिछड़े पन का जिम्मेदार मानते हैं। वो कहते हैं अंग्रेजों के समय से बिहारियों के गिरमिटिया बनाने की परंपरा आज भी जारी है और बिहार के प्रवासी मजदूर आजतक गिरमिटिया जैसी स्थिति में ही हैं, यह स्थिति उन्हें बेहद दुखी और उद्देलित करती है।

अ पने अनुभव व  कौशल को छात्र युवाओं के हित में इस्तेमाल कर उन्हें  प्रेरित करना।बिहारियों में उद्यमिता की भावना का  प्रचार व उत्प्रेरक के तौर पर कार्य कर बिहार की तरक्की में योगदान देने  की भरपूर मंशा व ऐसे व्यक्ति समूह के निर्माण की योजना पर कार्यरत। 

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