एक तरफ पूरा देश दीवाली मनाने की तैयारी कर रहा है तो दूसरी तरफ कश्मीर घाटी में शहीद हुए जवानों के घर में मातम पसरा हुआ है। इन शहीदों के परिवार जीते जी शायद ही कभी दीवाली मना भी पाएंगे। कश्मीर घाटी में शहीद हुये जवानों में एक लेफ्टिनेंट ऋषि रंजन बिहार के बेगुसराय जिले के और जवान मंदीप सिंह पंजाब से थे।इनमें शहीद ऋषि रंजन मातापिता के इकलौते पुत्र थे।एकलौते पुत्र को सेना में भेजने का कलेजा और उस बेटे के शहादत को बर्दाश्त करने की हिम्मत एक आम मध्यम वर्गीय या गरीब भारतीय देशप्रेमी को ही हो सकता है।करोड़पतियों और तथाकथित 56 इंच वाले पॉलिटिशियन को इतनी हिम्मत नहीं कि वो अपनी औलादों को सेना में भेज दें।
मैं तीन दिनों से भारत माता के इस वीर सपूत की फ़ोटो व इसके शहादत में लिखे गए पोस्ट को पढ़ रहा हूँ पर मैं इस वीर सपूत की फ़ोटो को ज्यादा देर तक देख पाने व श्रद्धांजलि के दो शब्द लिख पाने की नैतिकता नहीं जुटा पा रहा हूं।
भारत में देशप्रेमियों व देश के लिये कुर्बान होने वालों की लम्बी कतार रही है पर देशप्रेम की जो बयार 2014 में मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से थोड़े पहले चलाई गई है वो पहले शायद नहीं थी।हमारे जवान शहीद होते थे,अखबारों व रेडियो व टेलीविजन पर खबरें आती थी।शहीदों के तिरंगे में लिपटे पार्थिव शरीर उनके गांव पहुंचते थे और आसपास के लोग उनकी अंतिम यात्रा में शामिल होकर शहीदों के प्रति अपने श्रद्धांजलि देने का कर्तव्य पूरा कर लेते थे।
सोशल मीडिया के उदय,उसके आम लोगों तक पहुंच ने अब शहीदों के शहादत को राष्ट्रव्यापी बना दिया है।परन्तु सोशल मीडिया पर लिखे गए ज्यादातर पोस्ट मुझे रस्म अदायगी और बनावटी भर लगते हैं।देश भक्ति से ओत प्रोत हुये पोस्ट को लिखने वालों में बहुत कम ऐसे लोग दिखे जो खुद या उनके परिजन सेना में हों पर पोस्ट लिखने में तो एक कतरा भी खुन नहीं खर्च होता न बस लच्छेदार शब्दों का भण्डार व उसे समेट कर फेंकने की कला यानी चाहिये।इन शहादतों को वायरल करने वालों में अधिकांश वैसे लोग हैं जो देशभक्ति की मार्केटिंग करना जानते हैं।
बहरहाल मोदी जी 2014 के पहले के तत्कालीन युपीए सरकार की आतंकवादियों को काबू न कर पाने की आलोचना व एक सर के बदले दस सर लाने के वादे दोनों ही पैमाने पर खड़े नहीं उतर सके।धारा 370 हटाने के बाद ऐसा भरोसा दिलाया गया कि जल्द ही सब कुछ सामान्य हो जाएगा लेकिन दुर्भाग्य से सरकारी दावे अभीतक तो गलत निकले।
शहादतों का सिलसिला जारी है और शहीद हो कौन रहे हैं?
अम्बानी,अडानी,टाटा,बिरला, रुईया, संघवी,पटेल या अग्रवाल के बेटे? या किसी बड़े नेता की औलादें?
शहीद ऋषि रंजन को श्रद्धांजलि देने की नैतिकता मुझमें तो नहीं है,एक गुस्सा है उस व्यवस्था के प्रति जो युद्ध को कारोबार समझती है, शहीदों के लाशों पर वोटों का सौदा करती है। जब तक विश्व देश की सीमाओं में सीमित है युद्ध व सीमा पर तनाव की घटनाएं होती रहेंगी पर लाशें गरीबों व माध्यम वर्गीय लोगों ,किसानों के बेटे की ही गिरे बाकी सब सोशल मीडिया, शोक सभाओं में शहीद वेदी पर श्रद्धांजलि व फूल मालाएं चढ़ाकर रस्म अदायगी करें ,दिखावा करें यह नहीं चलेगा।
देशभक्ति की जिम्मेदारी सबकी है और भागीदारी भी सबकी होनी चाहिये।।यह सुनिश्चित करने के लिये देश में सैन्य सेवा के लिये अनिवार्यता सुनिश्चित होनी चाहिये।खासकर देश के धनाढ्य व पूंजीपतियों के बाल बच्चों,सांसद, विधायकों की औलादों को सेना में एक निश्चित अवधि की सेवा अनिवार्य होनी चाहिये।सिर्फ दूसरों के घर खुदीराम बोस,भगत सिंह,ऋषि रंजन और मनदीप सिंह के पैदा होने की भावना को बदलने की जरूरत है।
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