अंडमान निकोबार समूह की जनजातियां
भारत विविधताओं से भरा देश है भारत में एक कहावत है "कोस कोस पर पानी बदले चार कोस पर वाणी " यहां की संस्कृति हो, भाषा या भोजन हो सब एक निश्चित भौगोलिक दायरे के बदलते ही अलग नजर आती है।यहां के लोग भी अनेक जातियों व जन जातियों में बंटे हुए हैं।यह एक ऐसा देश हैं जिसके एक भाग में कड़ाके की ठंड होती है, बर्फबारी होती है तो दूसरा हिस्सा 48℃ पर तप रहा होता है।देश के किसी भाग में मूसलाधार बारिश की वजह से बाढ़ आने की स्थिति होती है तो दूसरा हिस्सा सूखे की मार झेल रहा होता है।इसलिये भारत को उपमहाद्वीप भी कहा जाता है। भारत के हर प्रान्तों में विभिन्न जनजातियां निवास करती हैं जिन्हें हम आदिवासी भी कहते हैं इतिहास कहता है कि ये जनजातियां भारत के मूल निवासी हैं।
भारत में जनजातियों की बहुलता वाले राज्यों की बात करें तो नार्थ ईस्ट के राज्य,झारखंड,ओड़ीसा,छत्तीसगढ़,अण्डमान निकोबार द्वीपसमूह जनजाति बहुल राज्य हैं।आइये आज नजर डालते हैं अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की जनजातियों के बारे में थोड़ा विस्तार से जानें। यह एक केंद्रशासित क्षेत्र है और यहां जन जातियों के छह समूह निवास करते हैं।
अंडमान द्वीप समूह की जनजातियाँ
महान अंडमानी
महान अंडमानी 10 अलग अलग जनजातियों का समूह है जो पहले द्वीप के एक बड़े हिस्से में रहते थे।इनकी भाषाएं भी अलग-अलग थी पर भाषाओं और संस्कृति में बहुत समानता थी। ये बाहरी दुनियां से बिल्कुल कटे हुए थे और सरकारी सहायता व सुविधाओं से वंचित थे परन्तु ब्रिटिश के आगमन के बाद लोगों को इस जनजाति के बारे में पता चला।
जरावा
जारवा जनजाति की कुल आबादी 500 के आसपास है और यह वर्तमान भारत की सबसे छोटी जनजाति में से एक है। ये अब भी खुद को दुनिया से अलग रखते हैं अभी भी ये आदिम जीवन जीते हैं और कर लिया था और अब भी ऐसा कर रहा है और फलों और जानवरों के शिकार पर निर्भर रहते हैं।
ओंजे
ओंजे अंडमान की सबसे पुरानी जनजातियों में से एक है। कुछ दशक पहले तक ये भी दुनिया से कटे हुए थे पर धीरे धीरे इन्होंने आधुनिक सभ्यता से खुद को जोड़ना शुरू किया है ।सरकारी योजनाओं के लाभ से उन्होंने पक्के घर बनवाने शुरू किए हैं और चिकित्सा सुविधा भी इन्हें उपलब्ध कराई जा रही है।
सेंटीनिलिज
सेंटीनिलिज अभी भी खूंखार जनजातियों में गिने जाते हैं, बाहरी दुनियां से ये बिल्कुल मिलना जुलना पसन्द करते । सेंटी निलिज भारत की जनजातियों में सबसे अधिक आक्रामक मानी जाती है। इनके रहने की जगह भी गुप्त है जहां पहुंचना काफी दुर्गम माना जाता है। वे अभी भी अन्य लोगों के साथ बिल्कुल भी दोस्ताना नहीं हैं और इनसे मिलने की कोशिश करने वालों पर ये पत्थरों और धनुष-बाण से हमला कर देते हैं।
निकोबार द्वीप समूह की जनजातियाँ
निकोबारी
निकोबारी जनजाति मुख्यतः समुद्र तटों के निकट रहना पसंद करते हैं और बाहरी दुनियां से इनका सम्पर्क अधिक है ये आधुनिक विकास के विरुद्ध नहीं हैं परन्तु समुद्र तटों के पास रहने की वजह से इन्हें तूफानों और प्राकृतिक आपदाओं का बराबर सामना करना पड़ता है।
शोम्पेन
शोम्पेन जनजाति एक खानाबदोश जनजाति है इसलिए बाहरी दुनियां से इनका सम्पर्क काफी अच्छा है।इन्हें सरकार की सहायता व अन्य प्रकार की मदद या राहत लेने से गुरेज नहीं है।स्वभाव से ये थोड़े डरपोक होते हैं।
आप यदि अंडमान निकोबार की यात्रा करने का और इन जनजातीय समूहों को देखने की योजना बना रहे हैं तो आपको खुली इजाजत नहीं मिलेगी। हालांकि इन आदिवासी इलाकों में जाने की कोई मनाही नहीं है लेकिन सरकार ने एहतियातन इन इलाकों में आम आदमियों खासकर बाहरी सैलानियों को जाने की इजाजत नहीं देती है?
प्रतिबंधित करने की मुख्य वजह अधिकांश जनजातियों का बाहरी लोगों के लिए आक्रामक होना है क्योंकि अक्सर विदेशी सैलानियों के प्रति ये दुश्मनों जैसा व्यवहार कर बैठते हैं। दूसरी वजह यह है कि इनमें से ज्यादातर भोजन के प्राकृतिक स्रोतों जैसे मछलियों, फलों आदि पर निर्भर हैं। इसलिए, आधुनिकीकरण के किसी भी प्रयास से इन्हें आक्रमण का आभास होने लगता हैं।
प्रतिबंध की एक और महत्वपूर्ण वजह हैं कि अभीतक इन तक आधुनिक चिकित्सा पध्दति को इन्होंने स्वीकार नहीं किया है तो सरकार ऐहतियात के तौर पर इन्हें बाहरी लोगों से दूर रखने की कोशिश करते हैं ताकि इन्हें बीमारियों व संक्रमण से महफूज रखा जा सके।

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