बिहार के सबसे पुराने जिले में से एक मुंगेर के चण्डिका स्थान के बारे में आपने जरूर सुना होगा।मुंगेर जिला मुख्यालय के उत्तर पूर्वी छोड़ पर स्थित चण्डिका स्थान देश के सिद्ध शक्तिपीठ में से एक है।
यहां देवी सती के बाएं आंख की प्रतिकृति विराजमान हैं और सदियों से इनकी पूजा अर्चना होती है।यूँ तो वर्षभर श्रद्धालुओं का आना जाना लगा रहता है परंतु मंगलवार और नवरात्रि के वक्त यहां श्रद्धालुओं की भीड़ जमा रहती है। नवरात्रि के अवसर पर रोजाना हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है।आसपास के गांव से श्रद्धालु गंगाजल लेकर मां चण्डिका की पूजा अर्चना करने पैदल पहुंचते हैं।
चण्डिका स्थान को लेकर दो प्रमुख किंवदंती प्रचलित है।एक तो देवों के देव महादेव की पत्नी सती से सम्बंधित है।जैसा कि ग्रंथों में कहा गया है कि सती के पिता द्वारा आहूत यज्ञ में अपने दामाद शिव को आमंत्रित न किये जाने से यक्ष की पुत्री सती नाराज हो गयी। नाराज होकर सती ने हवन कुंड में कूद कर अपनी जान दे दी शिव को जब यह मालूम पड़ा तो वो मां सती की मृत देह को अपने त्रिशूल पर उठाए पागलों की तरह ब्रह्मांड में विचरण करने लगे।शिव के रौद्र रूप को देख देवलोक में हाहाकार मच गया और किसी प्रलय की आशंका से सभी भयभीत हो गए।
शिव के गुस्से को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को टुकड़े टुकड़े कर दिये।माता सती के शरीर के 51 हिस्से भूलोक पर जहां जहां गिरे वह स्थान सिद्धपीठ के रूप में प्रसिद्ध हुआ। मुंगेर में देवी सती की बायीं आंख गिरी थी इसलिए इस सिद्ध शक्तिपीठ में देवी के आंखों की पूजा अर्चना की जाती है।ऐसी मान्यता है कि चण्डिका स्थान के गुफा के दीवारों में लगी कालिख को आंखों में काजल की तरह लगाने से आंखों की व्याधि दूर होती है। वैसे भी शास्त्रों के अनुसार प्रजापति दक्ष की पुत्री सती को शक्ति, ऊर्जा, वैवाहिक सुख, दीर्घायु, सौंदर्य, सद्भाव, आकर्षण, युद्ध, शांति, रौद्रता, सौम्यता, सुख, प्रकृति, पतिव्रत धर्म, स्त्रीत्व, संस्कार और सदाचार की देवी
माना जाता है।अतः श्रद्धालुओं की हर मनोकामना यहां पूर्ण होती है।
दूसरी किंवदंती महाभारत काल के दानवीर कर्ण से जुड़ी है जिसके अनुसार चण्डिका स्थान में एक सिद्ध देवी विराजमान थी जहां अंगराज कर्ण रोज पूजा अर्चना करने पहुंचते थे उनकी पूजा से प्रसन्न होकर देवी उन्हें रोज सवा मन सोना देती थी जिसे कर्ण गरीब प्रजा को दान में दिया करते थे।कालांतर में राजा विक्रमादित्य को जब कथा मालूम पड़ी तो वो भी तड़के उठकर वहां पहुंच गए और देवी का आवाहन करते वहां मौजूद तेल के खौलते कड़ाह में कूद गए।देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें पुनर्जीवित किया और वर मांगने को कहा विक्रमादित्य के वर मांगने व उसे पूरा करने के बाद देवी अंतर्ध्यान हो गई और कड़ाह उल्टा हो गया।वर्तमान में मौजूद चण्डिका स्थान को श्रद्धालु कड़ाह का अंदरूनी हिस्सा मानते हैं और अन्दर विराजमान देवी की पूजा अर्चना करते हैं।
51 शक्तिपीठ आज की भौगोलिक स्थिति के अनुसार भारत सहित अन्य पड़ोसी देश नेपाल,भूटान,तिब्बत,बंगलादेश व पाकिस्तान में मौजूद हैं। मुंगेर स्थित चण्डिका स्थान की महिमा अपरम्पार है और जिन्होंने सच्चे मन से देवी से कुछ मांगा उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। आवागमन की बाधा की वजह से दूर इलाके के लोगों को मां चण्डिका के दरबार में पहुंचने में अवरोध थे जिस वजह से ज्यादा श्रद्धालु यहां तक नहीं पहुंच पाते हैं।अब यह बाधा जल्द ही दूर होने वाली है।चिरप्रतीक्षित मुंगेर खगड़िया सड़क मार्ग का शीघ्र ही उद्घाटन होने वाला है।इस सडक़ मार्ग के चालु होने से पुराने मुंगेर जिले से अलग हुए हिस्से बेगूसराय व खगड़िया से मां चण्डिका स्थान तक पहुंचना अत्यंत सुगम हो जाएगा।साथ ही मिथिला,कोशी व तिरहुत प्रमंडल से भी इसकी दूरी काफी कम हो जाएगी।
श्रद्धालुओं की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए मुंगेर,बेगूसराय, खगड़िया के सांसदों, विधायकों,विधान पार्षदों सहित स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को मुंगेर के प्रसिद्ध शक्तिपीठ चण्डिका स्थान के विकास हेतू गम्भीर प्रयास करना चाहिए। मुंगेर के आसपास मौजूद सीताकुंड, गंगा की धारा के मध्य स्थित सीताचरण,कष्टहरणी घाट,ऋषिकुंड, भीम बाँध, खड़गपुर झील इत्यादि को यदि पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जाए तो मुंगेर को अतिरिक्त आय की प्राप्ति होगी व वर्षों से उपेक्षित इस जिले को नई प्राणवायु प्राप्त होगी।
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