मुंगेर जिला मुख्यालय स्थित श्री कृष्ण सेवासदन बन्द होने के कगार पर,किसी उद्धारक की बाट जोह रहा है श्री कृष्ण सेवासदन व पुस्तकालय


 पढ़ाई लिखाई में रुचि रखने वाला मुंगेर जिला मुख्यालय का कोई भी व्यक्ति ज्ञान की अनमोल स्मृति श्री कृष्ण सेवासदन से शायद ही अपरिचित होगा।कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र हों,खबरों की हर कतरन को पढ़ने का शगल रखने वाले अखबारों या मैगजीन के मुरीद हों श्री कृष्ण सेवासदन के वाचनालय व पुस्तकालय से जरूर अवगत होंगे।हजारों पुस्तकों की थाती समेटे यह पुस्तकालय अब जीर्ण शीर्ण अवस्था में है और भारी कुव्यवस्था का शिकार है।


मुंगेर के श्रीकृष्ण सेवासदन का उद्घाटन 31 अक्टूबर 1953 में देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू के कर कमलों से हुआ था।उद्घाटन के अवसर पर देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद द्वारा व्यक्त निम्न उद्गार से इस महान संस्था के महत्व को ठीक तरीके से समझा जा सकता है।

मुझे यह जानकर बड़ी प्रसन्नता है कि श्री कृष्ण सेवा सदन(मुंगेर) का उद्घाटन हमारे प्रधानमंत्री के हाथों 31 अक्टूबर 1953 को होने जा रहा है।देश की वर्तमान स्थिति में,जब हम बहुमुखी उन्नति को तत्पर हैं, ऐसे जन सेवा सदनों का बड़ा महत्व है।इसमें कोई संदेह नहीं है श्रीकृष्ण सेवा सदन के द्वारा बिहार में ही जन सेवक तैयार नहीं होंगे,ऐसी मेरी कामना है ।आशा है कि सदन अपने जनहित कार्यों द्वारा जनता का सौहार्द, सहयोग और सहायता पाने में सफल होगा"

डॉ राजेंद्र प्रसाद जी के उक्त सन्देश से श्री कृष्ण सेवासदन की उपयोगिता व महत्ता कितनी थी यह स्पष्ट हो जाती है।परन्तु आज श्री कृष्ण सेवा सदन की हालत जर्जर है और यह अपने उद्देश्यों को फलीभूत करने में अक्षम है।

श्री कृष्ण सेवासदन की स्थापना के पीछे बड़ा ही सुंदर लक्ष्य निर्धारित किया गया था पुस्तकालय, वाचनालय,होम्योपैथी डिस्पेंसरी, खादी के प्रचार प्रसार की जिम्मेदारी जैसे कई महान उद्देश्य संस्थापकों ने तय किये थे।संस्थापकों की आशा के अनुरूप इसे मुंगेर व देश के गणमान्य व समाजसेवियों का सहयोग भी इसे मिला।

1957 में शहर के उद्योगपति केदारनाथ गोयनका ने सर्वाधिक राशि दान में दी थी। श्री बाबू ने अपने निजी पुस्तकालय की 1 लाख से ज्यादा पुस्तकें तो राजा दिलीप सिंह ने अपनी माता के नाम  पर एक पूरे विभाग के लिये पुस्तकों सहित धनराशि दान में दी।गणमान्य लोगों के साथ सामान्य नागरिकों ने भी 1 रुपये से 100 रुपये का दान इस पुस्तकालय को दिया।आप श्री कृष्ण सेवा सदन के भवन के प्रवेश द्वार पर लिखी शिलापट्ट को देखेंगे तो इस संस्थान के नींब से शिखर के निर्माण में शामिल दानदाताओं के नाम पाएंगे। सदन के विजिटर्स बुक में देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल सहित तमाम हस्तियों के कॉमेंट्स अंकित हैं। मुंगेर का यह गौरवशाली धरोहर बन्द होने के कगार पर है।पुस्तकालय जबतक ट्रस्ट के अधीन था तबतक यह ठीक ठाक चल रहा था पर जैसे ही यह सरकारी सिस्टम के तहत आया इसकी हालत दिन ब दिन खस्ता होती चली गयी।

वर्षों से पुस्तकों की खरीद नहीं हुई है, नए कर्मियों की भर्ती नहीं हुई है आज सिर्फ दो कर्मचारी इस पुस्तकालय को किसी तरह चला रहे हैं।होम्योपैथी क्लिनिक तो कब का बंद हो चुका है।एक समय था जब देश के तमाम हिंदी,अंग्रेजी,उर्दू समाचार पत्र,पीरियोडिकल्स एवं जर्नल्स,हिंदी व अंग्रेजी की तमाम साप्ताहिक, पाक्षिक व मासिक पत्रिकाएं इसके वाचनालय की शोभा बढ़ाते थे।वाचनालय दिन के दो वक्त खुलता था और 200 से 500 पाठक नियमित रूप से वाचनालय में आते थे।आज हालत यह है कि पुस्तकालय के लिए नई किताबों की बात तो दूर वाचनालय में सभी पत्र व पत्रिकाएं भी खरीदी नहीं जाती।

सवाल है कि इस गौरवशाली धरोहर की दुर्दशा के लिये कौन जिम्मेदार है? आज मुंगेर के सांसद और विधायक सत्ताधारी दल से है,सूबे में एक शिक्षित इंजीनियर मुख्यमंत्री है ,केंद्र की सत्ता के विकास के तमाम वादे व दावे हैं फिर भी श्री कृष्ण सेवा सदन बदहाली का शिकार क्यों है? आज इस महान संस्थान की प्रबंधक समिति में कमिश्नर से लेकर अनुमंडलीय समाहर्ता शामिल हैं जिन्होने शिक्षा के बल पर यह मुकाम हासिल किया है उनकी आंखों में शर्म क्यों नहीं है?

श्री बाबू की फ़ोटो की पूजा करने वाले,उनके नाम पर वोटों की तिजारत करने वालों का ज़मीर कहां खो गया है? मुंगेर की शिक्षित जनता जिसकी तीन चार पीढ़ियों ने इस संस्था से ज्ञान की ज्योति पाई है उनका मन इसकी बदहाली पर क्यों नहीं विचलित होता है,उनकी जुबान पर ताले क्यों पड़े हैं?

हम आज ज्ञान युग में जी रहे हैं तो ज्ञान की यह ज्योति मद्धिम क्यों पड़ गयी है?इस संस्थान के खर्च को चलाने के लिये तत्कालीन प्रबन्धकों ने इसके अहाते के बाहर दुकानें बनवाई थी, किसी समय ट्रस्ट के सचिव रहे शहर के नामी वकील आनंद विजय ने सामने श्री कृष्ण उद्यान के चारो तरफ दुकानें बनवा कर इसकी आय बढ़ाने का उपाय किया था।पुरानी दुकान जर्जर पड़ी है, दुकानदारों के किराए का पुनर्निर्धारण नहीं हुआ है।जिस संस्था के निर्माण में स्थानीय लोगों ने बढ़चढ़कर आर्थिक सहयोग दिया उस संस्था के किराएदार न किराया बढ़ाना चाहते हैं न नियमित तौर पर देना चाहते हैं।कई दुकानदारों ने अनुबंध का उल्लंघन कर इसे तीसरे पक्ष को ज्यादा किराए पर लगा रखा है।

पुस्तकालय प्रबंधन व सरकार चुपचाप बैठी इसके बन्द होने का इंतजार कर रही है कल हो सकता है कोई इस गौरव को भी निजी हाथों में सौंपकर पुस्तकालय की जगह शॉपिंग मॉल या कॉरपोरेट अस्पताल बनवा दे।मुंगेर के जनता को पुरखों की इस अनमोल धरोहर को बचाने,इसके आधुनिकीकरण की मांग उठानी चाहिये और जरूरत पड़े तो आंदोलन की तैयारी करनी चाहिए।

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