"भारतीय गणतंत्र के जनतंत्र में जन व गण की भागीदारी व भारत के भविष्य की राजनीति"
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भारत में अधिकांश लोग अक्सर यह कहते हुए पाये जाते हैं कि राजनीति बुरी चीज है या फिर बुरे लोगों के लिए ही राजनीति है। इस विषय पर चर्चा करते हुए सबसे पहले मैं यह कहना चाहता हूं कि मेरी पिछले तीन दशकों से ट्रेड यूनियन में सक्रिय भागीदारी रही,एक ट्रेड यूनियन के एक्टिविस्ट के तौर पर भारतीय राजनीति,दलगत राजनीति का परोक्ष रूप से हिस्सा रहा,अनुभव मिलाजुला रहा।
अनेक खट्टे मीठे कड़वे अनुभवों के बावजूद मैं यह मानता हूं कि एक नागरिक होने के नाते राजनीति से दूर रहना उचित निर्णय नहीं है। राजनीति बुरी है, बुरे लोगों के लिए ही राजनीति है ऐसा कहकर खुद को राजनीति से अलग कर लेना या बस वोट देने की रस्म अदायगी से लोकतंत्र मजबूत नहीं होता। भारतीय गणतंत्र के जनतंत्र में जन और गण हाशिये पर धकेल दिए गए हैं उसका सबसे बड़ा कारण है जन गण की उदासीनता।
लोकतांत्रिक देश के नागरिकों की यह नैतिक जिम्मेदारी है कि उन्हें राजनीति में रुचि रखनी चाहिये,रुचि का पैमाना आप अपनी स्थिति के अनुसार तय कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि आप सक्रिय राजनीति में आकर दलगत राजनीति करें,चुनाव लड़ें और धीरे धीरे उस सड़ी गली राजनीति का हिस्सा बन जाएं जिसकी वजह से पूरी राजनीति ही बदनाम हो गयी है। राजनीति के बारे में यह सोच विश्वव्यापी बन चुकी हमने हाल ही में गंदी राजनीति के कुछ दृश्य अमेरिका जैसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश में भी देखा है।
हम जब राजनीति को राजनेताओं को और राजनीतिक दलों को कोसते हैं तो यह प्रश्न खुद से पूछने की जरूरत है कि इसके लिए हमारी जिम्मेदारी कहां तक है, हमसे एक व्यक्ति और समाज के रूप में कहां चूक हुई।
हमें यह समझने की जरूरत है कि यदि जिम्मेदार और समझदार लोग राजनीति से अलग हो जाएंगे तो फिर पक्ष और विपक्ष दोनों में बुरे लोगों का नियंत्रण होगा और फिर परिणाम उसी अनुरूप होंगे।
आज भारतीय संसद व विधानसभा के चुने गए जनप्रतिनिधियों के बारे में चर्चा करें तो हालात दयनीय और लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है।
भारतीय संसद के 53% सांसद यानि आधे से अधिक सदस्य दागी हैं।
दागी होने का मतलब उनपर चल रहे विभिन्न धाराओं के आपराधिक मुकदमे हैं। यह भी सही है कि राजनीतिक कार्यकर्ताओं पर मुकदमे होना आम बात है, राजनीतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने शासन द्वारा मुकदमें दायर करना अलग बात है। आँकड़ों के अनुसार अब संसद जहां देश का विधान बनता है और उनके सदस्यों को लॉ मेकर कहा जाता है में लॉ ब्रेकर विराजमान हो रहे हैं।
हमने यह भी देखा है दबंगई,गुंडागर्दी के बल पर राजनीति में आये लोग सीएम बनने के बाद सबसे पहला काम यह करते हैं कि अपने ऊपर चल रहे तमाम आपराधिक मुकदमों को निरस्त करने का आदेश!
आंकड़ों का दूसरा सच है संसद व विधानसभा में करोड़पतियों की बढ़ती संख्या?
देश के नए चुने गए 542 में से 475 सांसद हैं करोड़पति: ADR
हालांकि करोड़पति होना व उनका चुनाव लड़कर किसी सदन का सदस्य चुना जाना भारतीय संविधान के तहत बिल्कुल जायज है। जब कुख्यात अपराधी व माफिया सरगना अपराध सिद्ध न होने तक माननीय सांसद या विधायक बनने के योग्य है तो फिर करोड़पतियों के चुनाव लड़ने व माननीय बनने में कोई दोष नहीं है। यहां गौर करने योग्य बात यह है कि ऐसे करोड़पति माननीयों में से अधिकांश लोग अपराधी,माफिया या भ्रष्ट अफसर,ठेकेदार हैं यह संकेत हमारे लिये और लोकतंत्र के लिये चेतावनी है और भविष्य के खतरे का संकेत है।यह संकेत इसलिये चिंतित करने वाली है क्योंकि लोकतंत्र को जनता का,जनता के लिए,जनता के द्वारा चुना गया शासन बताया गया है। पर आज हमारे देश में जनता की भागीदारी कितनी है। बमुश्किल 60 से 70 प्रतिशत लोग वोट गिराते हैं ,एक तिहाई भागीदारी तो चुनाव में ही कम हो जाती है,कुल पड़े मतों का 33 प्रतिशत से 40 प्रतिशत मत लाने वाला दल भारत व किसी राज्य का भाग्य विधाता बन जाता है।
आज देश में चुनाव लड़ना कितना महंगा हो गया है जब स्थानीय निकायों के चुनाव में मुखिया, वार्ड पार्षद बनने के लिये लाखों खर्च कर देते हैं तो विधानसभा, लोकसभा के चुनाव में होने वाले खर्च की कल्पना करना ही आम जन के लिये ही डरावना है।इसी बढ़ते खर्च की वजह से राजनीतिक दल अब जनता के बीच काम करने वाले राजनीतिक कार्यकर्ता की जगह आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को टिकट बांटने में तरजीह देने लगे हैं।इस वजह से अपराधी व माफिया सरगना, ठेकेदार, भ्रष्ट अफसरशाह टिकट लेने में और जीतने में कामयाब हो जाते हैं।अब जब ये लॉ ब्रेकर लॉ मेकर बनेंगे तो नीतियां कैसी बनेंगी, नीतियों का पालन किस प्रकार होगा और जनतंत्र में जन व भारतीय गणतंत्र में गण के हिस्से क्या आएगा।
जैसा कि हम जानते हैं कि लोकतंत्र मौजूदा स्थिति में एक बेहतर शासन प्रणाली कही जा सकती है और यह तभी और बेहतर और मजबूत हो सकती है जब जन गण की सक्रिय व सचेतन भागीदारी हो।हम वोट देकर पांच साल इंतजार नहीं कर सकते हमें वोट देने से पहले,वोट देने वक्त और उसके बाद भी सक्रिय रहने की जरूरत है। फेमस उक्ति है कि जिंदा कौमें 5 वर्ष तक इंतजार नहीं करती।हम हरदिन सक्रिय व सचेतन रहना होगा।हम जहां हैं, जिस स्थिति में हैं हमें हिस्से की राजनीतिक जिम्मेदारी निभानी होगी इसी को लोक शाही कहते हैं।जाति गोत्र, धर्म,भाषा,के आधार पर भेंड़ की तरह किसी दल या उम्मीदवार को आंख मूंदकर वोट देना लोकतांत्रिक जिम्मेदारी नहीं है।
लानत उनको जो अपने मत की कीमत नहीं समझते और वोट डालने ही नहीं जाते और भरपूर धिक्कार उनको जो चंद नोटों व दारू की बोतल पर वोट की सौदेबाजी करते हैं, अपना मत नीलाम कर देते हैं। हमें इन विषयों पर गौर करने की जरूरत है इसे व्यक्त करने की जरूरत है।लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी को बड़ा महत्व दिया गया है ।
भारतीय गणतंत्र के असली मालिक जन गण को खुद आगे आकर भारत के भाग्यविधाता की जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी।
मैंने तीन दशकों के अपने ट्रेड यूनियन व जन आंदोलनों में अपनी भागीदारी से यह सीखा है कि "बोलने से कुछ न कुछ होता है" इस लेख के अंत में प्रसिद्ध शायर व कवि फैज अहमद फैज की कविता के कुछ अंश से करते हुए यही गुजारिश करेंगे कि लोकतंत्र को जिंदा रखना है तो बोलते रहिये
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे
बोल ज़बाँ अब तक तेरी है
बोल ये थोड़ा वक़्त बहोत है
जिस्म-ओ-ज़बाँ की मौत से पहले
बोल कि सच ज़िंदा है अब तक
बोल जो कुछ कहने है कह ले



1 टिप्पणियाँ
बहुत बढ़िया
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