फरदा ग्राम वर्तमान में NH 80 के बगल में अवस्थित है।इसकी सीमा डकरा नाला से शुरू होकर सिंघिया ग्राम की सीमा तक जाती है।फरदा ग्राम के बीच में पड़हम गांव है जो पहले से बसा हुआ है।
फरदा पहले गंगा दियारे में अवस्थित था इसलिये लोग अभी भी इसे फरदा दियारा के नाम से जानते हैं।फरदा पहले काफी सुखी व सम्पन्न था और वहां के जमींदारों का पूराने मुंगेर जिले के कई गॉंवों में जमींदारी थी।
मुंगेर जिले के बिन्दा दियारा,अग्रहन,फरदा ,लखीसराय के रामसीर खैरा, परसामा बेगुसराय के बहलोरिया, सोनमा, सुघरन, अयोध्या आदि में यहां के जमींदारों की जमींदारी थी।सभी जगह इनकी कचहरी थी और बड़ाहिल, नौकर,सिपाही व रसोइए नियुक्त थे।
फरदा दियारे अपने स्वादिष्ट मालदह आम के लिये प्रसिद्ध था हमने पूर्वजों से सुना है कि बगीचे के एक मालदह आम खाकर लोग संतुष्ट हो जाते थे।संपन्नता इतनी की एक ही दिन एक ही मंडप पर ग्यारह लड़कियों की शादी सम्पन्न हुई थी।उस वक्त एक रात की बारात वाली बात नहीं थी कम से कम एक दिन या उससे भी ज्यादा दिन तक मरजाद रखा जाता था।अब ग्यारह शादियों के एक साथ सम्पन्न होने हजार दो हजार लोगों के ठहरने की जगह ,उनके भोजनादि की व्यवस्था में होने वाले खर्च व प्रबन्धन से आप इस गांव के और उन जमींदारों के सम्पन्नता और क्षमता का सहज अंदाजा लगा सकते हैं।
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यहां के जमींदार परिवार से आने वाले बाबू हरि कुमर जिले के प्रतिष्ठित व प्रभावशाली व्यक्ति थे।जिले के लाट साहब की नियुक्ति होने पर होने वाले शिष्टाचार मीटिंग में इन्हें आदर से बुलाया जाता था और यह परंपरा उनके जीवित रहने तक कायम रही। आज़ादी के आंदोलन में फरदा के लोगों की कोई अधिकृत भागीदारी का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता पर यह प्रतीत होता है कि कांग्रेस के कई नामचीन नेताओं के छुपने का यह गांव सुरक्षित ठिकाना था।अपनी सम्पन्नता की वजह से स्वतंत्रता आंदोलन में इनकी वित्तीय सहयोग की बात भी हमने पूर्वजों से सुनी है।
स्वतंत्रता आंदोलन के प्रखर नेता व बिहार केसरी श्री बाबू के बाबू हरि कुमर से प्रगाढ़ता व आत्मीय सम्बन्ध इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि इस गांव के जमींदारों ने कांग्रेस नेताओं की आर्थिक मदद की होगी और अपने साम्राज्य में छिपने का सुरक्षित ठिकाना मुहैय्या किया होगा।जमींदारी प्रथा समाप्त होने के बाद भी इनके पास अकूत सम्पत्ति थी।और बाबू हरि कुमर की दूरदर्शीता उनके कांग्रेस नेताओं खासकर बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री बिहार केसरी बाबू श्री कृष्ण सिंह से दोस्ताना सम्बन्ध ने इस गांव की प्रतिष्ठा में कमी नही आई।
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परन्तु जहां तक मुझे स्मरण है कि हाथीदह व सिमरिया के बीच राजेन्द्र सेतु बनने के बाद गंगा की धारा ने मोड़ लिया और देखते देखते इस गांव को अपने गर्भ में समा लिया। गांव के गंगा में समाते ही इस गांव की सुख,समृद्धि,यश व प्रतिष्ठा भी विलीन होने लगी। इसकी जड़ों में मट्ठा डालने का काम किया परिवार के कुछ बेईमान और ऐय्याश हिस्सेदारों ने।गंगा के कटाव से लोग बेघर हुये, खेत खलिहान बगीचे सब खत्म हो गए। सरकार ने इन्हें अब के NH 80 के पूर्वी व पश्चिमी भाग में बसने की जमीन दिया,लोन दिया और धीरे धीरे फिर आशियाना बसता गया। इस कार्य में भी श्री बाबू एवं बाबू हरि कुमर की निकटता ने गांव वालों की काफी सहायता की।
आज मुंगेर नगर निगम में पड़ने वाला हेरुदीयारा, शिवनगर, काली थान फरदा दियारे के साथ सीमा में अवस्थित था। अभी डकरा पुल से शुरू होने नवटोलिया(सतखजुरिया) ,
मालिक पट्टी(पुवारी टोला),शिवरामपुर,दुआना, चार आना, कग्यारह आना,मिसिर टोला, जगन्नाथ पुर,रवि राय टोला, चलिस बिग्घी, भगवान टोला सब पुराने फरदा से ही आकर एन एच 80 के दोनों किनारे बसे हुए हैं। हालांकि गंगा के कटाव के कारण फरदा का नाम पंचायत के रूप में विलोपित हो गया अब फरदा गांव राजस्व मौजे के अनुसार इंदरुख पश्चिमी व पड़हम पंचायत के अंतर्गत आता है।
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जमींदारों के ग्राम होने के बावजूद इस गांव के इतिहास शांतिपूर्ण व सौहार्दपूर्ण रहा है।पूर्वजों की मानें तो मालिकों व रैयतों में काफी सद्भावना थी। अंतिम दिनों में सामंती मानसिकता के कुछ हिस्सेदारों की बजह से कुछ हिंसा की घटनाएं हुई जिसमें एक मालिक को बदमाशों ने लाठी डंडों से घायल कर दिया बाद में उनकी मृत्यु हो गयी।पूर्वज बताते हैं कि गांव में और दूसरे जमींदार भी थे जिनमें स्वाभाविक तौर पर प्रतिद्वंदिता थी कभी कभार झगड़े भी होते थे सम्बद्ध व व्यवहार सौहार्दपूर्ण बना रहा।
एक बार का किस्सा बताते हुए मेरे बाबा कहते थे कि दोनों जमींदारों के बीच एक बार झगड़ा हुआ दोनों ओर से लाठी और बाना चले कई लोग घायल हुए पर जब घायलों को बैलगाड़ी पर लादकर अस्पताल ले जाने की बारी आई तो यह नहीं देखा गया कि दुश्मन कौन अपना कौन बल्कि गम्भीर रूप से घायलों को पहले बैलगाड़ी पर लादा गया।
बाबा कहते थे कि पक्ष और विपक्ष कोर्ट पर तारीख अटेंड करने के लिये एक ही टमटम से कचहरी जाते और कोर्ट में एक दूसरे के खिलाफ खड़े होते फिर एक ही सवारी से गांव वापस लौट जाते।
हालांकि दियारा कट जाने के बाद गांव की आर्थिक स्थिति बहुत नाजुक हो गयी। 31 जोड़ी बैलों के मालिक,दो बड़े बड़े दालानों व 35 कोठरी के शौचालय के मालिक सड़क पर आ गए उनमें से कुछ लोगों ने अपने खेतारी पैसों से पक्के मकान बनवाये पर कुछ लोगों की आर्थिक हालत ऐसी हो गयी के फुस के मकान में ही जिंदगी खत्म हो गयी।जमींदारों के वंशज के जिन गिने चुने लोगों ने पढ़ाई लिखाई की उन्हें बाबू हरि कुमर की चिट्ठी से क्लर्क,शिक्षक,दारोगा, वी एल डब्लू की नौकरी मिल गयी।एक व्यक्ति बाबू अवध किशोर कुमर बीपीएस के लिये चयनित हुए।वो छात्र जीवन में मार्क्सवाद से आकर्षित थे और सीपीआई के मुंगेर इकाई के सक्रिय सदस्य थे।बाद में संविद सरकार में मंत्री बने कॉम इन्द्रदीप सिन्हा के वे आप्त सचिव भी रहे।
कुल मिलाकर फरदा गांव काफी वर्षों तक गंगा के कटाव का दंश झेलता रहा जो पढ़े लिखे थे उन्होंने तो कहीं किसी तरह नौकरी का जुगाड़ कर लिया और थोड़े सुखी हो गए। जो कम पढ़े लिखे थे और जमींदारी की ऐंठन बरकरार थी उनकी आर्थिक स्थिति काफी बिगड़ी फिर 80 के दशक से मां गंगा की कृपा शुरू हुई और दियारा फिर से आबाद होने लगा ,दियारा के ऊपर होने से लोगों को काम मिला, पैसा मिला और जिंदगी फिर से रफ्तार पकड़ने लगी। नई पीढ़ी ने पूर्वजों से सबक लेते हुई रफ्तार पकड़ी,जमाने का नब्ज पकड़ा आज हर साल इस गांव के दस से ज्यादा युवक शिक्षक,पुलिस, रेलवे या सेना तथा अर्द्ध सैनिक बल के लिये चयनित होते हैं।इस काम में गांव की लड़कियां भी पीछे नहीं हैं।
सरकारी नौकरी में चयनित होने ,विभिन्न संस्कृति के लोगों से मिलने जुलने से गांव के लोगों की आपसी समझदारी भी बढ़ी है।जाति का भेदभाव उतना गहरा नहीं है।दोस्ती अब जाति के आधार पर नहीं वर्गीय आधार पर बनती है।बीते चार दशक में मेरा गांव काफी बदला है कभी जिस गांव में उंगली पर गिनने लायक पक्के मकान थे वहां शायद हो कोई कच्चा या खपरैल का मकान बचा है।हालांकि 6 दशक पहले आई विपत्ति ने आर्थिक रूप से गांववालों की कमर तोड़ी थी पर हालिया तरक्की ने गांव से लोगों का रिश्ता ही तोड़ दिया है।तरक्की की आस लिये जिन लोगों ने शहरों,महानगरों के लिये कुच किया था उनमें से अधिकांश वहीं के होकर रह गए हैं।अब गांव उन्हें बुलाता है पर गांव की सुनता कौन है।
(यह लेख मैं खुद के मेरे बाबा स्व.जय प्रकाश कुमर,स्व. भोला कुमर, स्व लक्ष्मी कुमर व बाबूजी स्व. सागर कुमर व गांव के कुछ अन्य बुजुर्गों के संस्मरण के आधार पर प्रस्तुत कर रहा हूं। इसमें लिखे शब्द सुने हुये है शैली बुनी हुई है तो त्रुटियां हो सकती है असहमति भी हो सकती हैंजिसके लिये क्षमाप्रार्थी हूं)
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