फरदा दियारा का कटाव सम्भवतः 1957 में हुआ इसके साथ ही गांव की समृद्धि, वैभव सब मानों गंगा मैया की कोख में समा गया।वर्तमान फरदा सरकार द्वारा अधिग्रहित जमीन पर बसाया गया है।उत्तर में यह डकरा नाला के सतखजुरिया(नवटोलिया) से शुरू होकर पुवारी टोला से सिंघिया के सीमान तक फैला हुआ है।सड़क के दोनों किनारे बसा यह गांव अब पुनः समृद्धि व उन्नति की राह पकड़ चुका है।
फरदा:मेरा गांव मेरा अभिमान भाग १
गंगा के कटाव के बाद डीह व खेत,बगीचा गंवाने के बाद भी कुछ दशकों तक जमींदारों के वंशजो का जलवा बरकरार रहा।जमींदारी प्रथा खत्म होने के पहले भिक्षु कुमर के वंशजों व दु आना के पास जमींदारी थी उसके कई दशक पहले जमींदारी शायद 7 आना टोला के मालिकानों के पास थी।डीह डामर के गंगा में विलीन होने के बाद बबुआनों की आर्थिक स्थिति डांवाडोल हुई । इनमें जो थोड़े होशियार थे और जिनके पास खेतारी था उन्होंने नए डीह पर आकर पक्के मकान बनवाये,बाकी ने खपरैल का मकान बनाया।कुछ वैसे भी थे जिनके छत फुस के थे।
बाकी के टोले में भी यही स्थिति थी,अन्य जाति के टोले में भी यही स्थिति थी जो रैय्यत मालिकों के प्यारे थे उनकी आर्थिक स्थिति भी अच्छी थी।उन्हीं में से कुछ लोग जमालपुर के रेलवे वर्कशॉप में खलासी की नौकरी पाने में सफल रहे तो उनकी स्थिति कुछ भूमिहारों से भी अच्छी थी।परन्तु गांव के कटाव के बाद भी फरदा में भूमिहारों का वर्चस्व बना रहा।पुवारी टोले के 15 घर वाले भूमिहार भी मालिक कहलाते रहे और टोले का नाम मालिक पट्टी फरदा बना रहा।
1959 में फरदा गांव पूरी तरह आबाद हो गया था और लोगों ने अपनी अपनी क्षमता व सरकार से मिली राहत से अपने आशियाने का निर्माण कर चुके थे।रोजी रोटी के लिए इंदरुख व पड़हम मौजे की जमीन में मजदूरी या बटाईदारी,शहर में निर्माण मजदूर ,ईंट भट्ठे पर मजदूरी के अवसर उपलब्ध थे।मिहनत मजदूरी कर जीने वालों के लिए जीविका के पर्याप्त साधन मौजूद थे।
परन्तु मिहनत मजूरी में विश्वास न रखने वाले कुछ लोगों ने अपराध को जीविकोपार्जन का रास्ता बनाया।बस की छत पर रखे सामानों को उड़ाना, रात्रि में सड़क पर लूटमार करना और आसपास के गांवों के समृद्ध लोगों के यहां डाका डालना इनका पेशा बन गया।।ऐसे अपराधियों की वजह से कुछ वर्षों के लिए फरदा गांव कुख्यात हो गया था।इस गांव के दो लोग तो अंतरराज्यीय अपराधियों के लिस्ट में शामिल थे।
फिर 1970 के बाद गंगा मैया ने अपनी धार बदलनी शुरू किया और 1975-77 तक दियारा पूरी तरह से आबाद हो गया।दियारा आबाद होने से लोगों को रोजगार मिला, रुचि बदली और फिर गांव अपने पुराने प्रतिष्ठा को वापस करने की कोशिश करता रहा।बिहार में समाजवादी आंदोलन के प्रभाव ने भी गांव की सामाजिक आर्थिक सोच व स्थिति में जबरदस्त बदलाव लाया।
लोहियावादी समाजवाद और लालू प्रसाद यादव के सामाजिक न्याय के दौर में यादवों व अन्य पिछड़ी जातियों के सामाजिक व आर्थिक स्थिति में बदलाव आया। सरकारी नौकरी तथा योजनाओं में मिली आरक्षण व छूट का लाभ उठाकर उन्होंने काफी उन्नति की।आज गांव के अनेक लोग सरकारी नौकरियों में हैं।जो नौकरी नहीं पा सके वो व्यवसाय कर रहे हैं। अधिक परिश्रमी युवक चिमनी भट्ठा पर काम कर अच्छी आय अर्जित कर लेते हैं बाकी के लोग मुंगेर शहर में दिहाड़ी मजदूरी कर अपनी उन्नति की ओर अग्रसर हैं।नीतीश कुमार द्वारा पंचायतों में लागू आरक्षण से भी पिछड़ी जातियों व दलितों में जबरदस्त बदलाव लाया है।आज भूमिहार बहुल पड़हम पंचायत में भी पिछड़े या अन्य पिछड़े मुखिया, सरपंच व पंचायत समिति के लिये चुने जाते रहे हैं।
कुल मिलाकर फरदा गांव अब किसी एक जाति के प्रभुत्व व समृद्धि का गवाह न होकर सामूहिक समृद्धि का प्रतीक बन चुका है।आज इस गांव के युवक ही नहीं बल्कि युवतियां भी शिक्षक, रेलवे व पुलिस ,अर्ध सैनिक बल व सेना के लिए चुने जाते हैं।मेरा सुखद अनुभव है कि फरदा गांव में आमतौर से शांतिप्रिय लोग हैं,छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो आज भी गांव के लोग अनावश्यक झगड़ों से दूर है ,कोर्ट कचहरी के झमेले से दूर है।

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